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नियति या साहस

    मनुष्य के हाथ में वे तो कुछ भी नहीं मगर जब भाग्य से लड़ने की बात कही जाए तो मानव कभी पीछे नहीं रहा उसने हमेशा अपने साहस का परिचय दिया|

     मनुष्य के हाथ में वैसे तो कुछ भी नहीं मगर जब भाग्य से लड़ने की बात कही जाए तो मानव कभी पीछे नहीं रहा उसने हमेशा अपने साहस का परिचय दिया यहाँ तक कि भगवान भी मानव रूप में धरती पर आये तो मानवीय साहस के बल पर रावण जैसे महापराक्रमी को हरा कर नये मानव मूल्यों को स्थापित किया |       

                            एक रचना इसी पर आधारित पेश हे:- 

                                                           



                                                                                   जग ने देखा राम को श्री हीन होते,

भूमिजा माता सिया पराधीन होते।
माया पति को भाई हित हतप्राय रोते,
जगपति को कुश बिछा भूमि पे सोते।
राम को भी हाय नियति ने ठगा था,
अवतार थे किन्तु कहो किंचित लगा था?

मित्रता की वो अमिट गाथा सुनी है?
शक्ति भक्ति की प्रणय से सौ गुनी है।
देखा था सबने सुदामा क्षुब्ध सोते,
पत्नी बच्चों को सदा रोटी को रोते।
किन्तु साथी पुण्य जब परचम पे होते,
चार तंदुल के लिए हरि भी पांव धोते।
भक्ति का जादू सभी को तब दिखा था,
कौन मानेगा नियति में सब लिखा था?

धर्म पथ दुष्कर हजारों विघ्न आते,
सुर असुर दोनों डगर से है डिगाते।
सत्य हित हरिचंद्र जैसे  दीन होते,
सौ मुहर के वास्ते मृत जीव ढोते।
पुत्र पत्नी बेचकर खुद भी बिका था,
किंतु राजा सच से ना किंचित डिगा था।
भाग्य मनु के सामने बौना दिखा था,
सच पे कब मानव कोई इतना टिका था ?

देवता होना कोई मुश्किल नहीं है,
तप तपस्या पर टिके काबिल वही है।
ये क्षणिक उपलब्धियां साहिल नहीं है,
आराम है मृत्यु कोई मंजिल नहीं है।
जग में जब भी नर ने कुछ ठाना अड़ा है,
खुद विधाता को स्वयं झुकना पड़ा है।
शब्द , सत्ता, द्रुत मशीनें, प्रासाद, गुम्मद,
स्वर्ग तक पुरूषार्थ से नूतन गढ़ा है।

✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'




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